Eklavya ki kahani एकलव्य के बारे में कई गलतफहमियां है, कई लोगों को एकलव्य का पूरा सत्य नहीं पता है, इसीलिए आज हम आपको अस्ल वेदों के अनुसार एकलव्य की पूरी कहानी का व्रतांत बताते हैं। एकलव्य को ना सिर्फ महाभारतकालीन युग में बल्कि आज भी पूरी दुनिया का सबसे महान शिष्य माना जाता है। (Eklavya ki kahani) 

 कम ही लोग जानते है कि एकलव्य आखिर किसका पुत्र था? लोग इस सवाल के जवाब अपने अपने हिसाब से देते जबकि सत्य ये है कि एकलव्य कुंती और वासुदेव के भाई राजकुमार देवश्रव का पुत्र था, जिसने उसको भगवान कृष्ण और पांडवों का चचेरा भाई बना दिया।  

वेदों के अनुसार जब एकलव्य का जन्म हुआ था तब ही संतों के द्वारा देवश्रव को यह चेतावनी दी गयी थी कि यह पुत्र समाज के लिए अभिशाप है और यदि देवश्रव ने इसका त्याग नहीं किया तो धरती पर अधर्म होगा।  (Eklavya ki kahani) 

हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र को भी संतों ने यही चेतावनी और सलाह दी थी लेकिन उन्होंने संतों की बात नहीं सुनी और अपने बड़े पुत्र के सुख में, उन्होंने अपना पूरा कुटुंब नष्ट कर लिया। 

एकलव्य के जन्म के बाद ही उसे हस्तिनापुर के पूर्व पश्चिमी जंगल में छोड़ दिया गया जहां उसे जंगलों के पश्चिमी भाग में रहने वाली एक जंगल जनजाति, निषाद या भील जनजाति के प्रमुख व्याटराज हिरण्यधेनु ने देखा और उसे गोद ले लिया। (Eklavya ki kahani) 

एकलव्य को उनके गुरु द्रोणाचार्य के लिए किए गए समर्पण भाव के लिए जाना जाता है। महाभारत में एकलव्य को एक ऐसे लड़के के रूप में दिखाया गया है जो कम उम्र अर्थात्‌ बचपन से ही धनुर्विद्या से मोहित था और वह हमेशा से ही धनुर्विद्या में महारत हासिल करना चाहता था ।  

इसी प्रकार जब वह थोड़ा ही बड़ा हुआ तो उसने गुरु द्रोणाचार्य का नाम सुना और मन ही मन उन्हें ही धनुर्विद्या का गुरु स्वीकार कर लिया। जब वह पहली बार गुरु द्रोणाचार्य से मिला और उसने अपनी शिक्षा लेने को इच्छा जताई तो गुरु द्रोण ने उसे विद्या देने से इंकार कर दिया क्योंकि वह शूद्र वर्ण से था। (Eklavya ki kahani) 

निराश परंतु दृढ़ संकल्प के साथ , एकलव्य घर लौट आया, और उसने मिट्टी से गुरु द्रोणाचार्य की एक सुन्दर मूर्ति बनाई और अपना कठोर अभ्यास करना शुरू कर दिया।  एकलव्य का मानना ​​था कि अगर वह अपने गुरु के सामने अभ्यास करते हैं, तो वह एक दिन दुनिया के सबसे विशेषज्ञ धनुर्धर बन जाएंगे।  

वह हर दिन, गुरुजी की प्रतिमा पर ताजे फूल चढ़ाता और मूर्ति के सामने इस विश्वास के साथ अभ्यास करता को जैसे किसी गुरु की निगाह शिक्षक प्रशिक्षण के दौरान शिष्य के लिए होती है। और गुजरते समय के साथ वह एक कुशल धनुर्धर बन गया।(Eklavya ki kahani) 

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अर्जुन और एकलव्य 

गुरु द्रोण पांडवों और कौरवों के गुरु थे और उन्हें शस्त्र विद्या देने के लिए उन्हें हस्तिनापुर रखा गया था। एक बार जब गुरु द्रोण अपने सभी शिष्यों के साथ जंगल में उनकी परीक्षा के लिए आए तो उनके साथ में अर्जुन के कुत्ते भी थे। कुत्ते जंगल में उसी स्थान पर पहुंच गए जहा एकलव्य गुरु द्रोण की मूर्ति बनाकर अपना अभ्यास कर रहा था। 

कुत्ते अनजान एकलव्य को देखकर भौंकने लगे। काफी देर बाद जब कुत्ते नहीं माने तो एकलव्य ने इस कला से तीर चलाए की कुत्ते को बिना किसी जख्म के उसका पूरा मुहँ तीरो से भर दिया। कुत्ते उसी समय अर्जुन के पास पहुंचे और कुत्ते की यह हालत देखकर क्रोधित हो गए। (Eklavya ki kahani) 

जब गुरु द्रोण ने बारीकी से कुत्ते के मुहं से तीर निकाले तो वे समझ गए कि यह काम किसी साधारण इंसान का नहीं है। वे कुत्ते के साथ एकलव्य के अभ्यास स्थल पर पहुंचे और अपनी हूबहू मूर्ति देखकर दंग रह गए तुरंत ही एकलव्य ने गुरु की चरण वंदना दी। 

गुरु द्रोण ने कहा कुत्ते पर तीर तुमनें ही दागे है? एकलव्य ने सिर हिलाया, उन्होंने कहा तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो लेकिन मैंने अर्जुन को यह वादा किया है कि में उसे दुनिया का सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर बनाऊँगा। (Eklavya ki kahani) 

इसपर एकलव्य को लगा कि शायद कोई प्रतिस्पर्धा होगी, इसीलिए एकलव्य बोला गुरु जी सब आपकी कृपा से है, में आपका ही शिष्य हूँ गुरु द्रोण बोले शिष्य तो तुम हो लेकिन मेरी गुरु दक्षिणा तुम्हें अदा करनी होगी। इसपर एकलव्य ने कहा गुरु जी जो आप आज्ञा दे! गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया और एकलव्य ने तुरंत ही अपना अंगूठा चाकू से काट कर गुरु द्रोण को दे दिया। 

गुरु द्रोण जानते थे एकलव्य के होते हुए अर्जुन कभी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं बन सकते और इसीलिए उन्होंने एकलव्य का अंगूठा मांग लिया जिसके बिना वह धनुष नहीं चला सकता था। (Eklavya ki kahani) 

हालांकि बाद में उन्होंने अपनी अन्य उँगलियों से अभ्यास जारी रखा लेकिन अब उसमे पहले जैसी सटीकता नहीं रह गयी थी। एकलव्य के इस भाव से प्रभावित होकर द्रोणाचार्य ने उन्हें उनकी भक्ति के लिए आशीर्वाद दिया।  इसके बाद, वे अपने अभ्यास और अपनी क्षमता में विश्वास रखने के कारण, वे अपनी असाधारण क्षमता और अपने शिक्षक के प्रति समर्पण के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे।

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एकलव्य की मृत्यु 

एकलव्य की मृत्यु के बारे में जो प्राचीन लेख और किंवदंतियों समाने आए उन सभी का कहना है कि एकलव्य का वध श्री कृष्ण ने किया। एकलव्य जिस समुदाय में रहता था, वह निषाद समुदाय दुष्ट जरासंध का समर्थक था इसीलिए जब श्री कृष्ण ने भीम के द्वारा जरासंध का वध कराया तो निषाद राज आग बाबुला हो गए।(Eklavya ki kahani) 

 एकलव्य अब अपने राजा की मौत का बदला लेना चाहता था और इसी नियत से उसने फिर द्वारका और कुंतीभोज में हर यादव को मारने की कोशिश करते हुए, भगवान कृष्ण के प्राचीन साम्राज्य द्वारका पर हमला किया, लेकिन भगवान श्री कृष्ण उसे और उसकी सेना को मारने में पूरी तरह सक्षम थे। 

महाभारत के द्रोण पर्व में स्वयं श्री कृष्ण इस बात की पुष्टि करते है कि उन्होंने एकलव्य को मारा। श्री कृष्ण कहते है हे पार्थ! तुम्हारी भलाई और समाज कल्याण के लिए निषाद का पुत्र जिससे गुरु द्रोण ने छल करके, उसका अंगूठा मांग लिया। जिसे हराना मुश्किल था जो दिन रात बिना रुके तीरो की तीव्र वर्षा कर सकता था ऐसे धनुर्धर का अंगूठा गुरु द्रोण ने छल से ले लिया।(Eklavya ki kahani) 

 हे पार्थ! अंगूठे से वंचित  एकलव्य  देवताओं, दानवों, राक्षसों के एक साथ आजाने पर युद्ध में पराजित होने में असमर्थ था। अपनी मजबूत पकड़, हथियारों में निपुण, और दिन-रात लगातार तीर वर्षा करने में सक्षम, वह सिर्फ एक साधारण पुरुषों द्वारा हराया जाने में असमर्थ था।  हे पार्थ! तुम्हारे भले के लिए वह युद्ध के मैदान में मेरे द्वारा मारा गया। 

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एकलव्य की यादे और मंदिर 

आज भी मध्य प्रदेश (MP) के अलीराजपुर में रहने वाले भील और भील समुदाय के धनुर्धर लोग तीर चलाते समय कभी भी अपने अंगूठे का इस्तेमाल नहीं करते हैं।  वह जगह बुझ कर अंगूठे का उपयोग नहीं करते क्योंकि ऐसा करके वे अपने पूर्वज एकलव्य के प्रति सम्मान का प्रदर्शन करते है और ऐसा वहां सदियों से होता आया है।(Eklavya ki kahani) 

हरियाणा के गुड़गांव में एक मंदिर है जो एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पूरी तरह से एकलव्य को समर्पित है।  ऐसा माना जाता है कि खांडसा गाँव में एक कमरे का मंदिर महाभारत के समय में बनाया गया था और यह ठीक उसी स्थान पर खड़ा है जहाँ एकलव्य द्वारा द्रोणाचार्य को गुरु-दक्षिणा के रूप में उसका दाहिना अंगूठा दिया गया था और फिर उसे वही दफनाया गया था।  उसी स्थान से सिर्फ 10 km दूर  स्वयं गुरु द्रोणाचार्य को समर्पित एक मंदिर है। (Eklavya ki kahani) 

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By Nihal chauhan

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