शिव कौन है? क्या है? क्यों है? यह सब कुछ बिल्कुल स्पष्ट हो सकता है यदि आप अध्यात्म पर थोड़ा सा भरोसा करेगे। सनातन धर्म के तीन मुख्य देवताओ में प्रमुख शिव शंकर ही है। त्रिमूर्ति में तीन देवता शामिल हैं जिसमें seजो दुनिया के लिए ब्रम्हा निर्माण की भूमिका निभाते हैं , विष्णु रखरखाव  की और महादेव शिव दुनिया के विनाश के लिए जिम्मेदार हैं। 

बाकी दोनों देवताओ का स्वरुप उनके कर्म के आधार पर सबको साफ नजर आता है, सनातन धर्म की लिपियों और दस्तावेजों के आधार से ब्रम्हा को दुनिया का रचियता माना जाता है। विष्णु समय समय पर इस दुनिया में अवतार लेकर लोगों के दुःखों को दूर करते है अर्थात विष्णु संसार के संरक्षक की भूमिका में हैं। शिव को संसार को नष्ट करने के लिए जाना जाता है। (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

लेकिन शिव की भूमिका उतनी स्पष्ट नहीं होती, हालांकि विद्यमान लोग उनकी भूमिकाओं को बखूबी समझते होंगे लेकिन फिर लोग अभी भी अभी तक इस बात से परिचित नहीं हैं कि आखिर शिव को विध्वंसक क्यों कहा गया है? 

लोगों ने अपनी समझ में शिव की भूमिका को गलत आंका है। सनातन धर्म की असली मान्यताओं के अनुसार शिव विध्वंसक तो है लेकिन यह समझना की वह किसके विध्वंसक है, यह हर व्यक्ति नहीं समझ पाता क्योंकि शब्दों के लोग सिर्फ शब्दों के मतलब तक सीमित है।   (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

लोगों के मन में कई तरह के सवाल उठते है जैसे कि-

एक व्यक्ति ने कहा कि –

  •  मुझे लगता है कि मुक्ति पाने के लिए योग जिम्मेदार है, लेकिन शिव तो स्वयं ही आदियोगी है, फिर उन्हें विध्वंसक क्यों कहा गया है?
  • क्या शिव हमेशा दुनिया का विनाश करना चाहते हैं? 
  • यदि वे संसार का विनाश करते है तो क्यों? 
  • क्या संसार के जिवित प्राणियों की मुक्ति के लिए शिव दुनिया विनाश करते हैं?? 

सारे सवाल जरुर आपको काफी तर्कसंगत लग रहे होंगे लेकिन ये सिर्फ तब तक ही तर्कसंगत है जब तक कि आप इनके जबाब तक नहीं पहुँचते। 

आपका मन और शिव – 

क्या आप किसी ऐसी चीज़ को कल्पना भी कर सकते हैं जिसे आपने ना कभी देखा ना कभी अनुभव किया? अब इसपर में आपसे सवाल पूछता हूँ कि क्या आप महसूस कर सकते है कि शिव कैसे होंगे? आपकी कल्पना में आपको ऐसा लगता होगा कि शिव एक विशाल देह वाले गले में नाग लिपटा हुआ और पूरा शरीर राख से पुता हुआ! आप कुछ ऐसे ही जानते है कि शिव ऐसे ही है। ऐसा आपको इसलिए लगता है क्योंकि आपने शिव के इसी स्वरूप को देखा है जो कि करीब करीब एक मिथ्या है, शिव निराकार है, उसका कोई आकार नहीं है।   (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

अर्थात संसार की उन चीजों के बारे में आपकी क्या राय है जो आपके अनुभव के परे है? जिन्हें आपने देखा नहीं ना ही महसूस किया! क्या संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे ना देखा जा सकता हो ना ही महसूस किया जा सकता हो? 

किसी भी ऐसी चीज के लिए आपकी प्रक्रिया सिर्फ उसी से निकलती है जिसे आपने देखा है या महसूस किया। अब ऐसी भी चीज हो जिसे आपने नहीं देखा जैसे कि शिव को तो आप उसे उन्हीं चीजों से जोड़कर देखते है जो आपने देखा और महसूस किया। जबकि सत्य यह है कि आप जो सोच रहे है वैसा नहीं है। 

ऐसी स्थिति में हमे विचार करना चाहिए कि हम ऐसे विचारों से मुक्त कैसे हो सकते है जो ज़बरदस्ती कुछ चीजों को ऐसा बना देते है, जिसकी संभावना की वो वैसे है ही नहीं। इसके कहते है मुक्ति जब आप मुक्त होंगे तभी आप शिव को या दुनिया की किसी भी ऐसी चीज को देख पायेंगे और उसके वास्तविक आकार को महसूस कर पायेंगे। यह तब तक नहीं हो सकता जबतक की आप ऐसी चीजें जो आपने देखी है और महसूस की है उन्हें अलग करे और दूसरे तरफ ऐसी चीजे जिन्हें ना आपने देखा ना महसूस किया दोनों को अलग अलग करे। 

स्वाभाविक हैं कि ऐसा सम्भव ही नहीं है क्योंकि कोई भी आम इंसान ऐसी किसी भी चीज की कल्पना भी नहीं कर सकता जिसे ना उसने देखा है ना ही महसूस किया है।   (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

तो फिर हम उन चीजों को कैसे समझेंगे जो ना दिखाई देती है ना महसूस होती है? जैसे कि शिव 

इसका एक ही उपाय है जो है मुक्ति! अब ये मुक्ति क्या है और मुक्ति किससे?  इससे पहले मुक्ति को समझा जाए जरूरी है कि आप ये समझे की बंधन क्या है? 

बंधन क्या है? 

यदि आप बंधन को समझते है तो बंधन से छुटकारा ही मुक्ति है। पर बंधन है और यह बंधन आपके मस्तिष्क पर है, क्योंकि आप सिर्फ उन्हीं चीजों के बारे में सोच सकते है या विचार कर सकते जिन्हें आपने अनुभव किया है। इसीलिए जब आप इस बंधन से मुक्त हो जाते है अर्थात आपका मन अब ऐसी चीजों को अभी ठीक तरह से अनुभव कर सकता है जिन्हें आपने कभी अनुभव नहीं किया। 

बंधन और मुक्ति 

आप अपने जीवन को सीमित अनुपात में जीते है जिसमें आपका मन सीमित है, आपके काम सीमित है, आपकी सोच भी सीमित है क्योंकि वह आपके अनुभवों के बंधन से प्रभावित है। यदि आप भौतिक शरीर और अपने मस्तिष्क के बंधन को समाप्त कर सकते हैं तो यह मुक्ति है।  असल में खुद को भौतिक शरीर से मुक्त करना खुद को खत्म करने का ही एक तरीका है। 

आपका पूरा व्यक्तित्व, आपकी पहचान, आपकी सोच यह सब कुछ आपको आपके मन और शरीर के जुड़ने से ही मिला है या यूँ कहें कि मन को शरीर बंधन में बंध कर मिला है। आप की यह पहचान इसलिए इतनी पुख्ता है क्योंकि आप अपने पूरे जीवन का अनुभव मात्र पाँच इंद्रियों से ही करते हैं अर्थात आप सिर्फ इन्हीं पाँच इंद्रियों के बंधन में बंध गए हैं। और यदि ऐसा हो कि आपकी ये पांचो इंद्रियाँ सो जाए, तो आप दुनिया को अनुभव नहीं कर सकते ना ही दुनिया आपको अनुभव कर पाएगी।   (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

आप अपनी इंद्रियों को पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाते लेकिन आप जितना भी उन्हें नियत्रंण में रख पाते है उसका ही नतीज़ा है कि आप बहुत कम अनुभव के साथ दुनिया और आसपास की चीजों को महसूस कर पाते है। 

हमारा सबसे पहला कार्य है कि हम शरीर और मन की उस पहचान को तोड़े । ऐसा हम योग के द्वारा कर सकते हैं, योग हमे इंद्रियों के बोध से परे ले जाता है। योग हमे हमारी इन्द्रियों पर सम्पूर्ण नियंत्रण देता है। लेकिन अधिकतर लोग योग की प्रथम सीडी पर ही पहुँच पाते है जिसमें बे संतुलित जीवन का अनुभव करते हैं जबकि योग के चरम पर पहुचने वाले लोग परमात्मा बन जाते हैं। उनके लिए कोई बंधन या पाबंदी नहीं होती ना ही कोई आकार और प्रकार होता है। 

जब एक बार व्यक्ति पूरी तरह से अपनी इंद्रियों का बोध कर लेता है, फिर वह मन और शरीर से मिली पहचान को घटाने लगता है और धीरे धीरे वह विलीन हो जाता है पूरे ब्रम्हांड में।   (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

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मुक्ति (मोक्ष) क्या है? 

लोग सोचते है कि मन और शरीर की पहचान को खो देने का मतलब है कि इंसान भावनाओ से मुक्त हो जाता है या वह फटे हुए कपड़े पहनेगा, और सड़क पर पागलों की तरह घूमेगा, बदबूदार, बिना नहाए ऐसे ही बेसुध हो जाएगा जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अपनी पहचान को ना जोड़ना एक अलग बात है और अपनी पहचान का ध्यान ना रख पाना अलग चीज है।

जब आप शरीर और मन की पहचान को घटाते है तब आपकी इंद्रियाँ और भी सक्रिय रूप से आपको बेहतर की तरफ ले जाती है क्योंकि अब आप किसी बंधन में नहीं होते सारी चीजे पारदर्शी हों जाती है और बेचैनी, जिज्ञासा, और द्वेष भावनाओ का अंत हो जाता है और असीम शांति और धैर्य का अनुभव होता है। धैर्य वही इंसान रख सकता है जो ज्ञानी है क्योंकि वह जानता है कि आज नहीं तो कल उसे सफ़लता मिलेगी ही या मोक्ष मिलेगा ही इसलिए वह धैर्य शील है और अज्ञानी व्यक्ति उतना ही अस्थिर होता है।   (शिव को विध्वंसक क्यों कहा जाता है?)

जब आप खुद को मन और शरीर से मुक्त कर लेते है तो सबकुछ आम ही होता है जीवन की सारी नित्य क्रियाएं भी आम लोगों की तरह ही होती है लेकिन फिर आप शरीर और मन की सभी प्रक्रियाओं से मुक्त हो जाते है। कोई दुःख दुखी नहीं करता और सुख सुखी नहीं कर सकता अर्थार्त हर तरह की समानता आ जाती है। 

यदि आप शरीर और मन के बंधन से मुक्त हो जाते है तो आप खुद को असीम महसूस करते है और जो असीम है क्या वह मुक्त नहीं है? 

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शिव के विध्वंसक होने का राज – 

शिव आपकी पहचान को नष्ट करते है यानि कि आपको मन और शरीर के बंधन से मुक्त करते है इसलिए उन्हें विध्वंसक या विनाशक कहा जाता है। यदि आप अपनी मन और मस्तिष्क के बंधन से मुक्त नहीं होते तब तक आप उन चीजों को नहीं समझ सकते को ना दिखती है ना महसूस होती है। 

जब तक आप मुक्त नहीं होते तबतक आप अपना कुछ सबसे अजीज खोने से डरते है, आपने इन सीमाओं को खुद बनाया है, जो आपको सीमित करती है। आध्यात्मिकता उस बुलबुले को फोड़ने जैसा है जिसे आप फोड़ना नहीं चाहते लेकिन जैसे ही आप इसे फोड़ते है, आप अनंत और असीम हो जाते हैं। समस्या सिर्फ आपके मन और शरीर की पहचान को मिटाने की है। 

आपको योग के जरिए इस बुलबुले में सुई चुभाना है और आप अनंत और असीम होंगे। 

आपके मन और आपका भौतिक शरीर दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए है या यूँ कहें कि आपका मन इस भौतिक शरीर के बंधन में है। जब आप इन्हें अलग कर लेते है तो आप मुक्त होते हैं। अर्थात आपको मुक्ति मिल जाती है। अपने भौतिक शरीर (physical body) से अपने मन का कनेक्शन तोड़ना आपको यह क्या कहलाता है? लोग इसे खुदको खत्म करना समझ सकते हैं। इसीलिए शिव को विध्वंसक कहा जाता है क्योंकि वे अपनी सभी इंद्रियों के चक्र को तोड़कर मुक्त है। उन्होंने काम, क्रोध, मोह, लालच सबका विनाश कर लिया है और वे मुक्त है। 

शिव संसार में आपको मुक्ति देते है अर्थात्‌ वो काम, क्रोध मोह और लालच कुछ भी उनको अपने वश में नहीं कर सकता उन्होंने मुक्ति पा ली है, वे सबका विनाश करके अर्थात मार कर हत्या करके नहीं बल्कि आध्यात्मिक रूप से आपको मुक्त करने वाले है और आपकी इंद्रियों के विनाशक है। 

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By Nihal chauhan

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